Tuesday, May 8, 2012

তুমি একা, আমি একা, এই জীবনের অন্ত -ও একা,
কেন ভাবে সবাই কর্মের ফল ও চিরান্তের লেখা I
তুমি ভাবো সময় আসলে , সব কিছু নিজে হয়ে যাবে,
আমি ভাবি কেন থাকবো বোসে দেখতে ভাগ্যের লেখা I

Wednesday, April 11, 2012

ऐ यार तुझसे अब क्या उम्मीद करूं
तूने तो मेरी ज़िन्दगी का तमाशा बना दिया

अपनी इन हसरतों को कहाँ छुपाया करूं
तूने इस आदमज़ात को खुदा समझा किया

लाख कोशिशें की, तेरे सितम पर बद्दुआ दिया करें
हमारे दिल को हमारी ये दुआ कबूल नहीं

किन्हें सताने चले थे हम?
उनकी इक आह पर हमें रोना आया

उस तस्वीर को हमने याद क्यूँ किया ?
जिसे भुलाने पर हमें सुकून मिला किया

सर झुकाकर सच्ची बात कही कि गलती हमारी थी
या, सच्ची बात कही - यही गलती हमारी थी?

हमें इस दर्द का कभी एहसास न होता,
काश इस रिश्ते की कभी आगाज़ न होती.

२०/०१/२००५
ख़ुशी की तलाश

जीवन में ख़ुशी कहाँ, ख़ुशी में जीवन ढूंढना,
स्थिति अपनी रही, यूँ ही आवारा घूमना I

                              आवारगी में आबरू बचाना मुश्किल,
                              क्या बद्दुओं में ख़ुशी मिलती है I

ख़ुशी बेशकीमती, मुंह छुपाये नहीं मिलती,
बिन जुबान को तो, दुआ भी नहीं मिलती I

                               ख़ुशी तो दिल में होती है, बंद कमरों कि तरह,
                               सड़क पर धूल में पड़ी भीख नहीं होती I

ख़ुशी तो पाक सौगात है, खैरात नहीं,
लेन-देन दोनों हैं, इक तरफा बात नहीं I

                               आवारा फिरने से, खाक मिली, राह नहीं,
                               ढूँढने को सौगात चले, दिल नहीं, कोई चाह नहीं I

राह में चलते गए, हर छोटी ख़ुशी चुनते,
और उन खुशियों की इक झीनी चादर बुनते I

                              राह की खुशियाँ कभी अपनी नहीं होती,
                              इनसे जीवन की कमी पूरी नहीं होती I

झीनी चादर ही रूह को गर्म कराती है,
आग की तपिश उसे सहन नहीं होती I

                             आग की तपिश ही सर्द जिस्म में अच्छी,
                             रूह की ठंढक क्या तब उष्म नहीं होती I

रूह को कम्पन से ख़ुशी मिलती है,
                            तन को गर्मी से सुकून मिलता है I
खाक में भी शरारा ढूंढना,
                            हर ख़ुशी में जीवन मिलता है I


२३/१०/२००२
पता न था .........
इक लम्बे अरसे में हासिल किया भरोसा टूट जाता है,
इक क्षण में, इक बात से, इक राज़ खुल जाने से I

पता न था .........
मुद्दतों - तन्हाई के बाद मिला यार छूट जाता है,
इक क्षण में, इक अहसास से, इक बार भरोसा टूट जाने से I

पता न था .........
पत्थर के इस दिल के अन्दर भी 'कुछ' टूट जाता है,
इक क्षण में, इस अकेलेपन से, इक यार छूट जाने से I

पता न था ..........
कभी जो न भरा, अश्कों का वो घड़ा फूट जाता है,
इक क्षण में, इक सोच से, इस 'कुछ' के टूट जाने से I

पता न था .......... पता न था ............ I
मुझे तो हर तरफ खुदा का नूर नज़र आता है I
मुझे तो पुतले में भी शबाब-ए-हूर नज़र आता है I
उम्र का मोड़ ये कैसा? नज़र क्या धोखा है?
हर हसीं चेहरा मुझे, अपना-सा नज़र आता है I
हर इक नज़र, अपने लिए बेताब नज़र आती है,
हर इक मुस्कान, मेरे लिए सौगात नज़र आती है I
कोई दो लफ्ज़ बोले, इश्क की बात नज़र आती है,
हर इक ज़श्न, हुश्न की रात नज़र आती है I
हर सांझ ढले बादल में चाँद नज़र आता है,
और चाँदनी में नई कायनात नज़र आती है I
जब उठा कागज - कलम बैठता हूँ, लिखने मैं,
हर नए लफ्ज़ में कविता की आगाज़ नज़र आती है I

२०/०७/२००३

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Sunday, January 15, 2012

इस भरे समंदर में
चेहरों के
पहचान खोजता अपनी
किधर जा रहा हूँ मैं?

हर रहगुज़र में,
चिपक जाता है इक नया चेहरा
और फिर,
पहचान ढूंढते उसकी
भटकता हूँ इक नई रहगुज़र से I

राहों के इस भूल-भुलैया में
खो चूका अपना असली चेहरा
भूलता हुआ उसका रंग - रूप,
मैं सोचता हूँ
नोंच डालूँ उन्हें
अपने मुंह से I

पर याद आती है वह मंजिल,
जिसे पाने दूर आया हूँ इतनी,
खोकर अपना आप -
अपना परिवार I
क्या उसे पाए बिना,
सही है लौट जाना ?

नहीं SSSS
ढूँढना होगा मुझे इन्हीं राहों पर
अपने पुराने रूप को,
या एक परिष्कृत रूप को
बढ़ना होगा अनवरत मंजिल की ओर
आगे सदा I

क्योंकि
लौटने वाले को कभी,
मंजिल नहीं मिलती -
है यह शाश्वत सत्य I