Friday, December 4, 2009

कांटे

हम कांटे हैं / फूलों के रक्षक / भक्षक नहीं / बचाते हैं उन्हें / उन दुष्ट हाथों से / जो बढ़ते हैं / तोड़ देने को / और मुरझा देने को उन्हें / या / फ़ेंक देने को उन्हें।

हाँ , ये सही है / कि बदवक्त / कुछ झोंके आते हैं / और , हमसे उलझकर / फूलों की कलियाँ / या फिर / नाजुक पंखुड़ियाँ / हो जाती हैं नष्ट ।

किंतु ये झोंके / होते हैं / समसामयिक पवनों के / और जिनके सामने / हम भी होते हैं बेबस / फूलों की तरह ।

एक बार फिर / कहता हूँ मैं / हम कांटे हैं / फूलों के रक्षक, भक्षक नहीं।

-dhairya / धैर्य -

5 comments:

मनोज कुमार said...

अच्छी रचना। बधाई। ब्लॉगजगत में स्वागत।

radhasaxena said...

Bahut sundar.

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

kshama said...

Saral sundar bhav..snehil swagat hai!

V. VIVEK said...

Bahut sundar! Badhai ho!
Mere blog par aapka swagat hai
www.alahindipoems.blogspot.com